तूलिकासदन

रविवार, 8 अप्रैल 2018

लघुकथाकार भूपिंदर सिंह,ज्ञान प्रकाश विवेक ,व दलीपसिंह वासन की लघुकथाएं ॥14-16॥

  

लघुकथाएं जीवन मूल्यों की 
 इस संग्रह का प्रथम संस्करण फरवरी 2013 में प्रकाशित हुआ है ।
सम्पादन सुकेश साहनी रामेश्वर काम्बोजहिमांशु ने किया है ।
प्रकाशक –हिन्दी साहित्य निकेतन
16साहित्य विहार
बिजनौर (उ प्र )246701
मूल्य-पचास रुपए मात्र 

       
यह निर्विवाद सत्य है कि  मनुष्य अपने में खोता जा रहा है और  स्वयंकेन्द्रित होने के कारण मानव मूल्य कगार पर खड़े सिसक रहे हैं । नैतिकता विहीन भटकन को  राह पर लाने के लिए इस संग्रह की लघुकथाएं उपयोगी ही नहीं अपितु बेहतर व स्वस्थ  समाज के सृजन की पृष्ठ भूमि तैयार करती हैं ।  इस पुस्तक में पृष्ठ 4-अपनी बात में ठीक ही कहा गया है –ये लघु कथाएँ सामाजिक प्रदूषण में प्राण वायु का काम करेंगी ।
      96 पृष्ठों के इस संग्रह में अनेक धुरंधर लघुकथाकारों की रचनाएं हैं जो सूक्ष्म होते हुये भी अपनी  सूक्षमता के कणों से संवेदना  जगाकर हृदय को बेचैन  कर देती हैं ।

कथा संग्रह से चुनी तीन लघुकथाएं पढ़िये । 

1--पहुँचा हुआ फकीर /भूपिंदर सिंह

एक कमरा कह लो ,या छोटा घर ।
वहीं सास ससुर ,वहीं पर बड़ी नन्द ,वहाँ ही छोटा देवर और एक तरफ पति –पत्नी की दो चारपाइयाँ।
बहू को दौरा पड़ने लगा । पलों में ही हाथ –पैर ढीले हो जाते । हाथों की उंगलियां मुड़ जातीं । ओठों का रंग नीला पड़ जाता । हकीमों की जड़ी –बूटियाँ देखीं ,डाक्टरों के टीके भी कराये ,पर फायदा कुछ न हुआ ।
       किसी ने एक फकीर के बारे में बताया । सात मील पर उसका डेरा था । पति ने उसे साइकिल पर बैठाया और चल दिया । रास्ते में एक बगीचा आया । हैंडल चुभने का बहाना लगाकर पत्नी उतर गई । दोनों बैठ गये , जी भरकर बातें  कीं । फिर उनकी आत्माएं एक हो गईं । दोनों को रोकने –टोकने वाला कोई न था ,जो मन में आया किया ।
       "आज की यात्रा से फूल सा हल्का महसूस कर रही हूँ ,बाबा जी ,जैसे कि कोई रोग ही न हो। " डेरे पर पहुँचकर उसने कहा ।
      "तो हर बुधवार ,बीस चौकियाँ भरो बेटी । दवा –दारू की जरूरत नहीं । महाराज भली करेंगे।''  

2--जेबकतरा /ज्ञान प्रकाश विवेक

      बस से उतरकर जेब में हाथ डाला । मैं चौंक पड़ा। जेब कट चुकी थी । जेब में था भी क्या ?कुल नौ रुपए और एक खत ,जो मैंने अपनी माँ को लिखा था कि मेरी नौकरी छूट गई है । अभी पैसे नहीं भेज पाऊँगा । तीन दिनों में वह पोस्टकार्ड जेब में पड़ा था। पोस्ट करने को मन ही नहीं कर रहा था।  

      नौ रुपए जा चुके थे । यूं नौ रुपये कोई बड़ी बात नहीं थी ,लेकिन जिसकी नौकरी छूट चुकी हो । उसके लिए नौ रुपए नौ सौ से कम नहीं होते । 
      कूछ दिन गुजरे ,माँ का खत मिला ,पढ़ने से पूर्व मैं  सहम गया ,जरूर पैसे भेजने का लिखा होगा ,लेकिन खत पढ़कर मैं हैरान रह गया । माँ ने  लिखा था ,बेटा ,तेरा पचास रुपए का भेजा हुआ मनीआर्डर मिल गया है । तू कितना अच्छा है रे !पैसे भेजने में कभी लापरवाही नहीं बरतता ।
मैं इसी उधेड्बुन में लग गया कि आखिर माँ को मनीआर्डर किसने भेजा होगा ?
      कुछ देर बाद एक और पत्र मिला । चंद लाइनें थीं ,आड़ी –तिरछी । बड़ी मुश्किल से पत्र पढ़ पाया । लिखा था ,"भाई नौ रुपए तुम्हारे और इकतालीस रुपए अपनी ओर से मिलाकर ,मैंने तुम्हारी माँ को मनीआर्डर भेज दिया है । फिकर न करना । माँ तो सबकी एक –जैसी होती है न ! वह क्यों भूखी रहे ?तुम्हारा जेबकतरा ।"

3--रिश्ते का नामकरण /दलीपसिंह वासन 

      उजाड़ से रेलवे स्टेशन पर अकेली बैठी लड़की को मैंने पूछा तो उसने बताया कि वह अध्यापिका बन कर आई है । रात को स्टेशन पर ही रहेगी । प्रात;वहीं से ड्यूटी पर उपस्थित होगी । मैं गाँव में अध्यापक लगा हुआ था ।पहले घट चुकी एक –दो घटनाओं के बारे में मैंने उसे जानकारी दी ।

      "आपका रात को यहाँ ठहरना उचित नहीं है । आप मेरे साथ चलें ,मैं किसी के घर में आपके ठहर  ने का प्रबंध कर देता हूँ ।"जब हम गाँव से गुजर रहे थे तो मैंने इशारा कर बताया –मैं इस  चौबारे में रहता हूँ ।
      "अटैची जमीन पर रख वह बोली –थोड़ी देर आपके कमरे में ही ठहर जाते हैं । मैं हाथ –मुँह धोकर कपड़े बदल लूँगी ।"

बिना किसी वार्तालाप के हम दोनों  कमरे में आ गए ।
      "आपके साथ और कौन रहता है ?"
      "मैं अकेला ही रहता हूँ ।"
      "बिस्तर तो दो लगे हुये हैं ।"
      "कभी –कभी मेरी  माँ आ जाती हैं ।"
      गुसलखाने में जाकर उसने मुंह –हाथ धोये । वस्त्र बदले । इस दौरान मैं दो कप चाय बना लाया । 
      "आपने रसोई भी रखी हुई है ।"
      "यहाँ कौन सा होटल है !"
      "फिर तो खाना भी यहीं खाऊँगी ।"
      "बातों –बातों में रात बहुत गुजर गई थी और वह माँ वाले बिस्तर पर  लेट भी गई थी।"

      मैं सोने का बहुत प्रयास कर रहा था ,लेकिन नींद नहीं आ रही थी । मैं कई बार उठकर उसकी चारपाई तक गया था । उस पर हैरान था । मुझ में मर्द जाग रहा था ,परंतु उसमें बसी औरत गहरी नींद सोई थी ।
      मैं सीढ़ियाँ चढ़कर छत पर जाकर टहलने लग गया । कुछ देर बाद वह भी छत पर आ गई और चुपचाप टहलने लगी ।
      "जाओ सो जाओ ,सुबह आपने ड्यूटी पर हाजिरी देनी है ।" मैंने कहा ।
      "आप सोये नहीं ?"
      "मैं बहुत देर तक सोया रहा हूँ ।"
      "झूठ।"
      वह बिलकुल मेरे सामने आ खड़ी हुई ,"अगर मैं आपकी छोटी बहन होती तो आपको उनींदे नहीं रहना था ।"
      "नहीं –नहीं ,ऐसी कोई बात नहीं ।" और मैंने उसके सिर पर हाथ फेर दिया। 
समाप्त 

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